अर्थ:
एक राम ऐसा भी है जो इन सब रूपों से परे है — निराकार, असीम, अव्यक्त।
वेदांत के अनुसार:
यह निर्गुण ब्रह्म है —
जिसे न शब्द पकड़ सकते हैं, न मन, न कल्पना।
उपनिषद कहते हैं:
“नेति-नेति” — यह नहीं, वह नहीं।
अर्थात जो कुछ भी तुम सोच सकते हो, परम सत्य उससे भी परे है।
गूढ़ अर्थ:
सत्य को वस्तु मत बना लो।
जैसे ही तुमने कहा “मैं जान गया”, तुम चूक गए
“सबसे न्यारा राम” का अर्थ:
- सत्य किसी धर्म, मूर्ति, विचार, पहचान में कैद नहीं हो सकता।
- परमात्मा अनुभव है, अवधारणा नहीं।
- वहाँ पहुँचकर “मैं” भी समाप्त हो जाता है।


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